सोते बेटे का माँ ने निचोडा लंड! - घर की बातें!
Family Sex Stories : माँ ने सुबह 4 बजे सोते बेटे का लंड थामकर निचोड़ा पूरा माल! किचन में लंड साथ सटाई अपनी गाँड! कॉफ़ी देते दिखाए बूब्स! चुदाई में बहनों की हिस्सेदारी!
दोस्तों, मैं आपका दोस्त सैम एक बार फिर हाज़िर हूँ। आज जो बात सुनाने जा रहा हूँ, वो कोई गढ़ी हुई कहानी नहीं है। ये मेरे एक दोस्त और ऑफिस के सहकर्मी संदीप के घर की है।
संदीप का खानदान उत्तर प्रदेश के एक बहुत छोटे से शहर से आता है, लेकिन ये घटना बॉम्बे में घटी। आगे की बात संदीप अपनी ज़ुबानी कहेगा।
प्यारे दोस्तों, मेरा नाम संदीप है। जो कुछ मैं बताने जा रहा हूँ, वो मार्च 2001 की बात है। मेरे एसवाईबीकॉम के फ़ाइनल एग्ज़ाम खत्म हो चुके थे और पूरा घर रिजल्ट के इंतज़ार में था।
उससे पहले अपना परिवार समझ लेना ज़रूरी है, वरना आगे की रातें अधूरी लगेंगी।
पिताजी का नाम अमरदीप है, उम्र चौवन। माँ शीना, छत्तीस साल की। बड़े भैया कुलदीप इक्कीस के हैं। और दो जुड़वा बहनें हैं - श्रेया और श्रुति, दोनों बीस की।
भैया बचपन से ही पढ़ाई से भागते रहे। किताब उनके हाथ में टिकती ही नहीं थी। पिताजी अकेले उन्हें शहर में बैठाकर नौकरी या कॉलेज में घसीटते तो बात बनती नहीं। तब ताऊजी साथ आए।
ताऊजी के घर तीन बेटियाँ हैं, कोई बेटा नहीं। वो अपनी ज़मीन किसी दामाद के नाम नहीं जाने देना चाहते थे। इसीलिए पिताजी और ताऊजी ने मिलकर भैया की शादी गाँव में तय कर दी और उन्हें खेतों पर बिठा दिया।
भाभी स्नेहा उन दिनों उन्नीस की थीं। दोनों अब उसी पुरानी ज़मीन पर खेती करते हैं।
हमारे खानदान में ज़मीन बेचने का रिवाज कभी रहा ही नहीं। बड़ों ने हमेशा यही कहा कि खेत हमारी जड़ हैं, इन्हें बाज़ार में नहीं उतारा जाता। इसलिए भैया गाँव में टिके, और हम बॉम्बे में।
श्रुति और श्रेया दोनों बहुत खूबसूरत हैं, गदराए बदन की मालकिन। ग्रेजुएशन खत्म कर चुकी हैं, नौकरी ढूँढ रही हैं। श्रुति थोड़ी शर्मीली है। श्रेया खुले विचारों वाली है। घर में वो अक्सर शॉर्ट स्कर्ट और हॉट पैंट्स पहनकर घूमती है।
कभी-कभी दोनों एक जैसा टॉप और स्कर्ट पहन लेती हैं, तब पहचानना मुश्किल हो जाता है कौन श्रुति है और कौन श्रेया।
माँ तक कभी-कभी कन्फ़्यूज़ हो जाती हैं। दोनों के कमरे से रात को कभी-कभी दबी हँसी और फुसफुसाहट आती है। उस समय मैं समझता था बहनें बातें कर रही हैं। बाद में पता चला कि माँ और बेटियों के बीच कपड़ों से ज़्यादा चीज़ें साझा थीं।
पिताजी बॉम्बे पोर्ट ट्रस्ट में बड़ी पोस्ट पर हैं। उम्र चौवन है, लेकिन बहुत छोटी उम्र से शराब की लत लग गई। हमेशा देसी ही पीते हैं। उनका कहना है देसी में जो बात है वो विदेशी में नहीं।
उसी की वजह से शरीर काफी कमज़ोर हो गया है। रोज़ सुबह सात बजे दफ़्तर जाते हैं, शाम सात बजे लौटते हैं।
माँ लखनऊ यूनिवर्सिटी से फ़र्स्ट क्लास ग्रेजुएट हैं, घर संभालती हैं। कभी-कभी सहेलियों के साथ पार्टी करती हैं, कभी रात भर का प्रोग्राम भी हो जाता है। दिखने में साधारण लगती हैं, लेकिन जब वेस्टर्न पहनती हैं तो श्रेया-श्रुति से भी आगे निकल जाती हैं।
ब्रांडेड कपड़ों का शौक है। श्रुति और श्रेया के अंडरगारमेंट भी वही ब्रांडेड ख़रीदती हैं। रंग एकदम गोरा है। बूब्स छत्तीस, कमर बत्तीस, गाँड अड़तीस। तीन बच्चों को दूध पिलाने के बाद भी स्तन लटकते नहीं, तने रहते हैं। घर में दुपट्टा मैंने माँ को कभी नहीं पहनाते देखा।
मैं उन्नीस साल का हूँ। पाँच फ़ुट ग्यारह इंच। बॉडी बिल्डिंग का शौक है, रोज़ जिम जाता हूँ। ग्रेजुएशन के साथ कंप्यूटर सॉफ़्टवेयर भी सीख रहा हूँ।
हमारा घर बॉम्बे के सबअर्ब में है। पिताजी ने दो फ़्लैट मिलाकर एक बड़ा मकान बना दिया। तीन बेडरूम, एक विशाल हॉल, एक किचन। एक बड़ा कमरा माँ-पिताजी का है, एक बड़ा कमरा दोनों दीदियों का, एक छोटा कमरा मेरा।
मेरे और दीदियों के कमरे का बाथरूम कॉमन है। उस बाथरूम के दो दरवाज़े हैं - एक मेरे कमरे से खुलता है, एक उनके कमरे से। घर में औरतें प्रायः वन-पीस या टॉप-स्कर्ट में रहती हैं।
मैं और पिताजी ज़्यादातर लुंगी या शॉर्ट्स और टी-शर्ट में।
एक रविवार रात डिनर पर टेबल पर सब थे। पिताजी के सामने देसी का आधा गिलास था, माँ सब्ज़ी परोस रही थीं, दोनों दीदी एक जैसी हल्की ड्रेस में बैठी थीं।
माँ ने परोसते-परोसते कहा, “कल सुबह साढ़े पाँच बजे पिताजी को दादर से चेन्नई की ट्रेन पकड़नी है।”
मैंने प्लेट से सर उठाया, “ठीक है माँ, मुझे साढ़े चार बजे जगा देना। मैं छोड़ आऊँगा। इस बार कितने दिनों के लिए जा रहे हैं?”
पिताजी ने गिलास रखा, “इस बार दस से बारह दिन रुकना पड़ेगा। वहाँ मीटिंग का सिलसिला लंबा खिंच गया है।”
माँ का चेहरा उतर गया। उन्होंने चम्मच धीरे से थाली के किनारे रखा, “आप वहाँ रहोगे तो सब्ज़ी और घर का सामान कौन लाकर देगा? बाज़ार के भाव भी आप ही तय करते हो। लड़कियाँ तो शॉपिंग के अलावा कुछ लाती नहीं।”
श्रेया ने मज़ाक में कहा, “माँ, हम लाएँगे ना।” श्रुति मुस्कुराकर रह गई। माँ ने उन दोनों को नज़रों-नज़र जवाब दिया, फिर पिताजी की तरफ़ देखी।
पिताजी ने मेरी तरफ़ ठोढ़ी घुमाई, “अपना संदीप है न। अब जवान हो गया है। मार्केट में सबसे मिला दिया है। ये मेरी हर ज़िम्मेदारी पूरी कर सकता है। दूध वाला, सब्ज़ी वाला, किराना - सब इसे पहचानते हैं।”
माँ ने मुझे आँख दिखाई, मगर आवाज़ में मज़ाक के नीचे थकान भी थी,
“सुबह जल्दी उठना है तो रात में जल्दी सो जाना। नहीं तो मुझे ही तुझे मार-मारकर उठाना पड़ेगा। हर बार घड़ी के सामने खड़ी रहती हूँ।”
“हाँ बाबा, उठ जाऊँगा। सिर्फ़ एक बार पुकारना।”
“हाँ-हाँ, पता है तुझे उठाने के लिए कितने जतन करने पड़ते हैं। दरवाज़ा खटखटाओ तो कम्बल ओढ़ लेता है। हाथ पकड़ो तो करवट बदल लेता है।”
पिताजी हल्के से हँसे और गिलास खत्म किया।
खाना उठते-उठते माँ ने दीदियों से कहा कि सुबह देर तक सो सकती हैं, ट्रेन का शोर उनके हिस्से का नहीं। मैं अपने कमरे की तरफ़ बढ़ा तो पीछे से माँ की नज़र एक पल मेरी पीठ पर टिकी रही। तब मैंने उसे कुछ नहीं समझा।
रात को नींद जल्दी नहीं आई। लुंगी पहनकर लैपटॉप खोला और फिर वही XXX फ़िल्म चला दी जो पिछले हफ़्ते अधूरी छोड़ी थी। स्क्रीन पर औरत के मुँह से निकली आहों के साथ घर भी पूरी तरह शांत नहीं था।
दीवार के उस पार दीदियों के कमरे से दबी हँसी आई, फिर कुछ रुककर एक लंबी साँस। मैंने वॉल्यूम बढ़ा दिया। सपने और फ़िल्म एक हो गए। लुंगी खिसक गई। लंड एकदम सीधा खड़ा हो गया, नसें उभर आईं।
आँख लगते-लगते भी वही Scene घूमते रहे - खुले बूब्स, गीली चूत, किसी के हाथ की पकड़।
सुबह चार बज रहे थे। माँ पहले दबे स्वर में पुकार रही थीं, “संदीप… संदीप बेटा।” मैं उठने ही वाला था कि मेरे कमरे का दरवाज़ा धीरे से खुला और माँ अंदर आ गईं। मैंने माथे पर हाथ रख लिया, ताकि लगे मैं अभी भी सोया हूँ।
माँ की नज़र मेरे खड़े लंड पर पड़ी, जो लुंगी से बाहर निकला हुआ था। वो एकदम रुक गईं। एक कदम पीछे लिया, फिर आगे। पीछे मुड़कर दरवाज़ा बंद कर दिया, कुंडी तक हाथ गया और रुक गया।
मैं चुप चाप पड़ा रहा। दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था, लेकिन साँस सोए हुए इंसान जैसी रखी।
माँ कुछ देर खड़ी रहीं। साँस बदल गई। कमरे की फीकी रोशनी में उनके होठ खुले।
उन्होंने अपना हाथ नाइटी के ऊपर से अपनी चूत पर रखा और धीरे-धीरे मसलने लगीं। जीभ होठों पर फिरने लगी। उस चेहरे पर वही भूख थी जो मैंने कभी-कभी दीदियों के कमरे से आती दबी आहों में सुनी थी।
उस रात मैंने सोचा था कोई सपना होगा। आज वो सच मेरे बिस्तर के पास खड़ी थी।
बाद के दिनों में आशा ने जो बातें खोलकर बताईं - माँ और बेटियों का खुलपन, रातों को एक-दूसरे के कमरे में जाना, खीरे-गाजर से आगे की चीज़ें - उसकी पहली झलक उसी चार बजे की खामोशी में मिल गई थी।
उस वक्त मैं सिर्फ़ इतना समझ पाया कि माँ डरी हुई नहीं हैं। वो भूखी हैं।
पाँच-छह मिनट तक माँ सिर्फ़ देखती रहीं। लंड की नस फड़कती रही। उन्होंने एक बार दरवाज़े की तरफ़ देखा, फिर बिस्तर के पास आईं।
आवाज़ इतनी धीमी थी कि कमरे से बाहर न जाए, “संदीप… संदीप…” कोई जवाब नहीं मिला तो उन्होंने समझा मैं सोया हूँ।
बायाँ हाथ मेरे लंड पर रखा। हथेली गरम थी।
उन्होंने उसे पकड़ा, तौला, फिर आगे-पीछे चलाने लगीं। सुपाड़े पर अंगूठा घुमाया, नीचे तक उँगली फेरी, फिर वापस सिर पर आकर धीरे से निचोड़ा। मैंने शरीर न हिलाया। दाँत भींचे रखे। पूरा मज़ा ले रहा था।
माँ की पकड़ पहले डरती हुई थी, फिर तेज़ हो गई जैसे सालों की प्यास एक ही सुबह उतरानी हो।
माँ के मुँह से फुसफुसाहट निकली, “इतना मोटा… इतना गरम… ये लड़का कब इतना बड़ा हो गया। तेरे पिताजी का तो इसका आधा भी न रहा होगा…”
हथेली गीली हो गई। रफ़्तार बढ़ी। मेरी कमर खुद-ब-खुद हिली।
माँ समझ गईं अब निकलेगा। मुट्ठी कस ली, दूसरी बार सिर पर अंगूठा घुमाया। एक ज़ोरदार पिचकारी छूटी। वीर्य उनके हाथ पर, लुंगी पर, पेट तक फैल गया। कुछ बूँदें उनकी कलाई से नाइटी पर गिरे।
माँ ने हाथ झटके से हटाया। उँगलियों के बीच सफ़ेद तार लटक रहे थे। एक पल उन्होंने उन उँगलियों को देखा, जैसे पहचान रही हों कि ये किसका है। साँस अभी भी तेज़ थी।
फिर चुपचाप कमरे से निकल गईं। बाहर जाकर दरवाज़ा धीरे से बंद किया।
दो मिनट बाद आवाज़ सामान्य कर ली, जैसे कुछ हुआ ही न हो।
“सनी, उठ। स्टेशन जाना है पिताजी को छोड़ने के लिए।”
मैंने वही नाटक रखा, “हाँ माँ, उठता हूँ। दस मिनट दो।”
नहा-धोकर हॉल में आया। लंड अभी पूरी तरह शांत नहीं हुआ था, इसलिए टी-शर्ट बाहर निकाली रही। माँ किचन में नाश्ता बना रही थीं, वही नाइटी पहने। पिताजी नहीं दिखे।
“पिताजी कहाँ हैं?”
माँ ने कड़ाही से नज़र नहीं हटाई, “शावर ले रहे हैं। दस-पंद्रह मिनट में तैयार हो जाएँगे। तू उनका बैग बेडरूम से लेकर दरवाज़े के पास रख दे।”
किचन तंग था। फ्रिज और गैस के बीच से निकलना ही पड़ता था। मैं माँ के पीछे से निकला तो जान-बूझकर हाथ उनकी गाँड पर फेरता हुआ गया।
नाइटी पतली थी। गोलाई साफ़ महसूस हुई। माँ ने स्पर्श पहचाना। मुड़ी नहीं। बस एक हल्की स्माइल दी, जैसे सुबह का हिसाब अभी बाकी हो। मैंने भी वही नाटी स्माइल लौटाई।
पिताजी के कमरे में गया। बाथरूम से पानी की आवाज़ आ रही थी। मैंने बैग उठाया।
लौटते समय लंड फिर खड़ा था - सुबह का रस निकला था, फिर भी शरीर नहीं माना। किचन के मुँह पर एक पल रुका और लंड माँ की गाँड पर दबाया। कपड़े के ऊपर से भी गरमी पहुँची।
माँ ने गाँड पीछे की, दबाव लौटाया। मेरा बायाँ हाथ उनकी कमर पर चला गया, उन्हें और सटाया।
दोनों उस दो मिनट में सब भूल चुके थे - बाप दस कदम दूर नहा रहा था, ट्रेन की घड़ी चल रही थी, दीदियाँ दूसरे कमरे में सोई थीं।
तभी पिताजी की आवाज़ आई, “शीना, मेरे कपड़े कहाँ हैं?”
हम दोनों एक साथ होश में आए। माँ का शरीर अकड़ा, फिर वो बेडरूम की तरफ़ चल दीं। मैं बैग दरवाज़े के पास रखकर साँस ठंडी करने लगा। लुंगी का तंबू छिपाने की जगह नहीं थी, इसलिए हॉल की खिड़की की तरफ़ मुँह कर लिया।
नाश्ता चुपचाप हुआ। पिताजी ने अखबार देखा, माँ ने चाय ढाली, मैंने टोस्ट काटा। मेज़ के नीचे माँ का घुटना एक बार मेरे घुटने से छुआ और हट गया। कोई बोला नहीं। स्टेशन पहुँचे। पिताजी डिब्बे में चढ़े, खिड़की से हाथ हिलाया। ट्रेन गई।
वापस बाइक पर हवा चेहरे से टकरा रही थी, लेकिन दिमाग में एक ही तस्वीर घूम रही थी। माँ का हाथ। उँगलियों के बीच लटका वीर्य। वो फुसफुसाहट - इतना मोटा, इतना गरम।
किचन में गाँड का दबाव। मैंने क्लच से ज़्यादा ज़ोर हैंडल पर लगाया। लंड फिर तन गया। घर तक का रास्ता पहले कभी इतना लंबा नहीं लगा।
घर आया तो दीदियाँ जाग चुकी थीं। श्रुति बाल संवार रही थीं, श्रेया हॉल में पानी पी रही थीं। दोनों ने देखा, कुछ पूछा नहीं। मैं अपने कमरे में गया और आवाज़ लगाई, “माँ, एक कॉफ़ी चाहिए।”
थोड़ी देर में माँ आईं। नाइटी बदल चुकी थीं। डीप नेक का क़मीज़ और सलवार। क़मीज़ झुकते ही दोनों स्तन साफ़ झूल गए, गहरी रेखा तक दिखी। उन्होंने प्याला टेबल पर रखा, एक पल झुकी रहीं जैसे तश्तरी संभाल रही हों।
मेरा हाथ लंड पर चला गया, कपड़े के ऊपर से सहलाने लगा। माँ की नज़र गई। उन्होंने देखा कि मेरी निगाह कहाँ अटकी है, और मेरा हाथ क्या कर रहा है। कुछ नहीं कहा।
थोड़ी सी मुस्कान दी - वही मुस्कान जो सुबह किचन में थी - और कमरे से निकल गईं।
कॉफ़ी पीकर मैं दोस्तों के पास चला गया। दिन भर बातें हुईं, सड़कें चलीं, चाय पी गई। शरीर पर माँ के हाथ की गरमाहट नहीं उतरी। दोस्त जब सिगरेट की बात करते, मैं माँ की फुसफुसाहट सुनता रहता।
शाम को जिम से लौटा तो घर खाली लगा। जूते उतारे, तभी किचन से बर्तन की आवाज़ आई। दोनों दीदी शॉपिंग गई थीं। सिर्फ़ माँ थीं।
दरवाज़े के फ्रेम से देखा - वही सुबह वाली पतली ड्रेस, गैस के सामने खड़ी, बाल कान के पीछे किए। मैं एक पल खड़ा रहा। फिर बाथरूम की तरफ़ बढ़ा, जैसे नहाना ही मकसद हो।
पानी गिरने लगा। याद आई सुबह की पिचकारी, किचन में गाँड पर दबा लंड, कॉफ़ी देते वक्त झुके बूब्स, माँ की उस एक पंक्ति में पिताजी का जिक्र। लंड फिर खड़ा हो गया। हाथ चलने लगा। आँखें बंद थीं।
मुँह से निकल पड़ा, “शीना, तुम्हारे बूब्स कितने सुंदर हैं… गाँड भी कितनी सुंदर है… आज इसे फाड़ देना चाहता हूँ।”
उसी वक्त बाथरूम का दूसरा दरवाज़ा खुला।
सामने श्रुति दीदी खड़ी थीं।
और मैं पूरा नंगा था!
आगे की कहानी : "जल्द ही - 26 September को!"
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